केजरीवाल ने मांगा इस्तीफा: रूसी तेल पर अमेरिकी छूट को बताया ‘राष्ट्रीय अपमान’
अरविन्द केजरीवाल ने रूसी तेल खरीद पर अमेरिका की 30 दिन की छूट के बाद पीएम मोदी से इस्तीफा मांगा। जानें पूरा विवाद।
आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने रूसी तेल की खरीद पर अमेरिका द्वारा भारत को दी गई 30 दिन की “छूट” (Waiver) के बाद प्रधानमंत्री मोदी के इस्तीफे की मांग की है।
केजरीवाल ने तीखी आलोचना करते हुए सवाल किया कि क्या 140 करोड़ की आबादी वाला भारत अब अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका की अनुमति का मोहताज है।
देश की राजनीति में उस समय भूचाल आ गया जब 6 मार्च, 2026 को अरविन्द केजरीवाल ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोला। यह विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी वित्त विभाग ने भारतीय रिफाइनरों को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की अस्थायी छूट देने की घोषणा की। केजरीवाल ने कड़े शब्दों में कहा कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और उसे तेल खरीदने के लिए किसी दूसरे देश की अनुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान नेतृत्व डोनाल्ड ट्रंप के सामने “नतमस्तक” हो गया है और देश के आत्मसम्मान को गिरवी रख दिया है। नई दिल्ली में जारी इस राजनीतिक घमासान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की कूटनीतिक स्वायत्तता पर नई बहस छेड़ दी है।
पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया में तनाव (विशेषकर ईरान-इजरायल संघर्ष) के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई है। 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर हुए अमेरिकी-इजरायली हमलों के बाद तेल की कीमतों में भारी उछाल आया। ऐतिहासिक रूप से भारत रूस से सस्ती दरों पर तेल खरीदता रहा है, लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने अपनी ऊर्जा नीतियों के तहत भारत पर रूसी तेल न खरीदने का दबाव बनाया था। हालिया 30-दिवसीय छूट को अमेरिका ने एक “उदार कदम” के रूप में पेश किया है, जिसे विपक्ष भारत की संप्रभुता पर हमला मान रहा है। केजरीवाल और कांग्रेस दोनों ने तर्क दिया है कि भारत को “मंजूरी” (Permission) जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने वाले देश के सामने झुकना नहीं चाहिए।
इस मुद्दे पर देश के प्रमुख राजनीतिक स्वर इस प्रकार हैं:
अरविन्द केजरीवाल (AAP): “भारत हजारों साल पुराना देश है। हमारे इतिहास में नेतृत्व कभी इतना कमजोर नहीं रहा कि हमें तेल खरीदने के लिए अमेरिका से ‘परमिशन’ लेनी पड़े। अगर कोई मजबूरी है तो मोदी जी को इस्तीफा दे देना चाहिए।”
राहुल गांधी (कांग्रेस): उन्होंने पीएम मोदी को “समझौतावादी व्यक्ति” (Compromised Individual) बताते हुए कहा कि भारत की विदेश नीति अब जनता की इच्छा के बजाय व्यक्तिगत दबावों से संचालित हो रही है।
अमेरिकी प्रशासन: अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह छूट केवल उन तेल जहाजों के लिए है जो समुद्र में फंसे हुए हैं, ताकि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनी रहे।
मल्लिकार्जुन खड़गे: कांग्रेस अध्यक्ष ने भारत को एक “वर्चुअल जागीरदार राज्य” (Virtual Vassal State) बनाने का आरोप लगाया।
इस राजनीतिक विवाद का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। यदि भारत अमेरिका की शर्तों को पूरी तरह स्वीकार करता है, तो उसे अधिक महंगा अमेरिकी तेल खरीदना पड़ेगा, जिससे देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का लगभग 40% तेल मिडिल ईस्ट से मंगाता है, जो युद्ध के कारण खतरे में है। ऐसे में रूसी तेल ही एकमात्र सस्ता विकल्प बचता है। केजरीवाल का बयान ग्रामीण और मध्यम वर्ग के उन लोगों के बीच गूंज रहा है जो महंगाई से परेशान हैं और इसे राष्ट्रीय गौरव के मुद्दे के रूप में देख रहे हैं।
साक्ष्य-आधारित विश्लेषण से पता चलता है कि अमेरिका की “अनुमति” वाली शब्दावली कूटनीतिक रूप से अपमानजनक मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) को बचाए रखने के लिए कड़ा रुख अपनाने की जरूरत है। केजरीवाल द्वारा इस्तीफे की मांग करना एक बड़ी राजनीतिक चाल है, जो आगामी चुनावों को देखते हुए राष्ट्रवादी मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश है कि भाजपा सरकार विदेशी दबाव में देश का सिर झुका रही है।
अगले 30 दिन भारत-अमेरिका संबंधों के लिए बेहद नाजुक हैं। सरकार की ओर से अभी तक केजरीवाल और विपक्ष के इन तीखे हमलों पर कोई आधिकारिक और विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है। उम्मीद है कि विदेश मंत्रालय (MEA) इस ‘छूट’ की शब्दावली पर अपनी स्थिति स्पष्ट करेगा। जनता की नजर इस बात पर होगी कि क्या भारत 30 दिन बाद भी रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा या पूरी तरह अमेरिकी दबाव में आकर अपनी रणनीतिक दिशा बदल देगा।
रूसी तेल पर अमेरिकी छूट और अरविन्द केजरीवाल की इस्तीफे की मांग ने देश में संप्रभुता बनाम कूटनीति की एक नई जंग छेड़ दी है। जहाँ सरकार इसे तेल आपूर्ति सुनिश्चित करने का एक जरिया बता सकती है, वहीं विपक्ष इसे देश के गौरव के साथ समझौता मान रहा है। यह नागरिक जागरूकता का समय है कि हम समझें कि अंतरराष्ट्रीय दबाव हमारे घरेलू खर्चों और राष्ट्रीय स्वाभिमान को कैसे प्रभावित करते हैं।