महबूबा मुफ्ती की मांग: खामेनेई की हत्या पर प्रदर्शन करने वाले शिया युवाओं को रिहा करें
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने आयतुल्लाह खामेनेई की मौत के विरोध में गिरफ्तार शिया प्रदर्शनकारियों को रिहा करने की मांग की। जानें पूरा विवाद।
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने उन शिया प्रदर्शनकारियों को तुरंत रिहा करने की मांग की है, जिन्हें आयतुल्लाह खामेनेई की हत्या के विरोध में प्रदर्शन करने पर हिरासत में लिया गया था।
महबूबा ने इस कार्रवाई को “असहमति की आवाज को दबाने वाला” और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया है।
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बार फिर नागरिक अधिकारों और हिरासत का मुद्दा गरमा गया है। 7 मार्च, 2026 को पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने श्रीनगर में एक कड़ा बयान जारी कर उन शिया प्रदर्शनकारियों की तत्काल रिहाई की मांग की, जिन्हें हाल ही में हिरासत में लिया गया था। ये प्रदर्शनकारी ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खामेनेई की हत्या (जो फरवरी 2026 में एक सैन्य अभियान में हुई थी) के विरोध में कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में शांतिपूर्ण मार्च निकाल रहे थे। महबूबा मुफ्ती ने प्रशासन की इस कार्रवाई को मजहबी भावनाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया है।
ऐतिहासिक और धार्मिक जुड़ाव
कश्मीर घाटी के शिया समुदाय का ईरान के धार्मिक नेतृत्व के साथ सदियों पुराना और गहरा आध्यात्मिक रिश्ता रहा है। 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर हुए हमलों और खामेनेई की मौत के बाद मध्य कश्मीर के बडगाम और श्रीनगर के पुराने इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई थी।
वर्तमान सुरक्षा स्थिति
प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के चलते कई इलाकों में सुरक्षा कड़ी कर दी और दर्जनों युवाओं को हिरासत में ले लिया। महबूबा मुफ्ती का मानना है कि यह नीति “डर का माहौल” पैदा करने के लिए अपनाई जा रही है, जिससे स्थानीय लोगों में नाराजगी और बढ़ रही है।
महबूबा मुफ्ती का कड़ा रुख
मुफ्ती ने सोशल मीडिया पर लिखा, “किसी की शहादत पर मातम मनाना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना कोई अपराध नहीं है। प्रशासन को यह समझना चाहिए कि दमन से विचार नहीं मरते। हिरासत में लिए गए युवाओं को उनके परिवारों के पास वापस भेजा जाना चाहिए।”
प्रशासन और पुलिस का तर्क
दूसरी ओर, पुलिस सूत्रों का कहना है कि प्रदर्शनों के दौरान कुछ तत्वों द्वारा उकसावे वाली गतिविधियों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की योजना की खुफिया जानकारी मिली थी। एहतियातन की गई इन गिरफ्तारियों का मकसद केवल शांति बनाए रखना है।
सामाजिक अस्थिरता: इन गिरफ्तारियों के बाद शिया बहुल इलाकों में तनाव की स्थिति बनी हुई है, जिससे स्थानीय व्यापार और स्कूल प्रभावित हो रहे हैं।
राजनीतिक लामबंदी: इस मुद्दे पर घाटी के क्षेत्रीय दल एक सुर में बात कर रहे हैं, जो आगामी निकाय चुनावों में सत्ताधारी दल के लिए चुनौती बन सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव: कश्मीर में हो रहे ये प्रदर्शन दर्शाते हैं कि वैश्विक घटनाएं (जैसे ईरान-इजरायल संघर्ष) सीधे तौर पर कश्मीर की आंतरिक शांति और राजनीति को प्रभावित करती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, महबूबा मुफ्ती का यह स्टैंड उनकी पार्टी के पुनरुद्धार की रणनीति का हिस्सा है। शिया समुदाय कश्मीर की राजनीति में एक महत्वपूर्ण वोट बैंक है। खामेनेई के मुद्दे को उठाकर वह न केवल धार्मिक सहानुभूति बटोर रही हैं, बल्कि खुद को कश्मीर के हितों के एकमात्र रक्षक के रूप में भी पेश कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशासन को ‘बल प्रयोग’ के बजाय ‘संवाद’ का रास्ता चुनना चाहिए ताकि स्थिति और न बिगड़े।
आने वाले दिनों में यदि प्रदर्शनकारियों को रिहा नहीं किया जाता है, तो घाटी के धार्मिक संगठनों ने बड़े पैमाने पर बंद और विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है। 10 मार्च, 2026 को कई बड़े जुलूस निकलने की संभावना है, जिसे देखते हुए प्रशासन और सुरक्षा बल हाई अलर्ट पर हैं।
महबूबा मुफ्ती द्वारा शिया प्रदर्शनकारियों की रिहाई की मांग ने एक बार फिर कश्मीर में अभिव्यक्ति की आजादी बनाम सुरक्षा के पुराने विवाद को छेड़ दिया है। प्रशासन के लिए चुनौती यह है कि वह सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान कैसे करें। शांति की बहाली के लिए युवाओं की रिहाई एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।