NEET PG कट-ऑफ जीरो हुआ: 95,000 अतिरिक्त डॉक्टर अब काउंसलिंग के पात्र
स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश पर NBEMS ने NEET PG 2024 के कट-ऑफ को घटाकर ‘जीरो पर्सेंटाइल’ कर दिया है, जिससे 95,000 अतिरिक्त डॉक्टर काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल होने के पात्र हो गए हैं।
नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि NEET PG 2024 के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ को घटाकर ‘शून्य’ (Zero) करने के बाद 95,000 से अधिक अतिरिक्त उम्मीदवार काउंसलिंग प्रक्रिया के लिए पात्र हो गए हैं। पीटीआई (PTI) की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने यह निर्णय देश भर के मेडिकल कॉलेजों में स्नातकोत्तर (Post Graduate) सीटों के खाली रह जाने की समस्या को हल करने के लिए लिया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के इस निर्देश के बाद, अब वे सभी उम्मीदवार जिन्होंने NEET PG परीक्षा में भाग लिया था, काउंसलिंग के मॉप-अप और विशेष स्ट्रे वेकेंसी राउंड में भाग लेने के हकदार होंगे।
NEET PG कट-ऑफ को कम करने का मुद्दा पिछले कई वर्षों से चर्चा का विषय रहा है। हर साल, नैदानिक (Clinical) और गैर-नैदानिक (Non-Clinical) शाखाओं में सैकड़ों सीटें योग्य उम्मीदवारों की कमी के कारण खाली रह जाती थीं। 2023 में भी इसी तरह का कदम उठाया गया था, जिसकी कुछ हलकों में कड़ी आलोचना हुई थी, जबकि अन्य ने इसे सीटों की बर्बादी रोकने के लिए आवश्यक बताया था। वर्तमान शैक्षणिक सत्र 2024-25 के लिए, शुरुआती काउंसलिंग राउंड के बाद भी बड़ी संख्या में सीटें खाली थीं, जिसके कारण चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय (DGHS) ने इस पात्रता मानदंड में ढील देने की सिफारिश की।
हितधारक आवाज़ें
सरकारी अधिकारी (स्वास्थ्य मंत्रालय प्रतिनिधि): “हमारा मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश का कीमती संसाधन—मेडिकल सीटें—बेकार न जाएं। कट-ऑफ कम करने से अधिक डॉक्टरों को विशेषज्ञता हासिल करने का मौका मिलेगा, जिससे अंततः स्वास्थ्य सेवा प्रणाली मजबूत होगी।”
विपक्ष/आलोचनात्मक आवाज़ (चिकित्सा शिक्षा कार्यकर्ता): “पात्रता को जीरो पर्सेंटाइल तक ले जाना ‘योग्यता’ (Merit) के सिद्धांत के साथ समझौता है। इससे चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है और यह केवल निजी कॉलेजों की सीटें भरने का एक जरिया मात्र है।”
विशेषज्ञ विश्लेषण (डॉ. अजय कुमार, चिकित्सा रणनीतिकार): “विशेष रूप से गैर-नैदानिक विषयों जैसे एनाटॉमी और फिजियोलॉजी में सीटें भरना मुश्किल होता है। यह कदम उन छात्रों के लिए राहत है जो कुछ अंकों से काउंसलिंग से बाहर थे, लेकिन यह प्रवेश परीक्षा की प्रासंगिकता पर सवाल भी खड़ा करता है।”
प्रभावित पक्ष (NEET PG उम्मीदवार): “यह उन उम्मीदवारों के लिए एक जीवनदान है जो सीमा रेखा पर थे। अब हमें कम से कम काउंसलिंग में बैठने और अपनी पसंद के विषय और कॉलेज के लिए प्रयास करने का अवसर मिलेगा।”
जमीनी हकीकत और प्रभाव
NBEMS द्वारा डेटा साझा किए जाने के बाद, मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) ने पंजीकरण पोर्टल को फिर से खोलने की तैयारी शुरू कर दी है। इस निर्णय का सबसे बड़ा प्रभाव निजी मेडिकल कॉलेजों और डीम्ड विश्वविद्यालयों पर पड़ेगा, जहाँ उच्च शुल्क के कारण सीटें अक्सर खाली रहती थीं। अब 95,000 नए दावेदारों के आने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, लेकिन साथ ही उन ब्रांचों को भी छात्र मिलेंगे जिन्हें पहले नजरअंदाज किया जा रहा था। अस्पताल प्रशासन का मानना है कि इससे जूनियर रेजिडेंट डॉक्टरों की कमी को दूर करने में मदद मिलेगी।
विशेषज्ञ विश्लेषण
कानूनी और नीतिगत दृष्टिकोण से, सरकार का यह कदम सुप्रीम कोर्ट में लंबित विभिन्न याचिकाओं के जवाब में आया है। विशेषज्ञों का तर्क है कि ‘पात्रता’ और ‘चयन’ दो अलग चीजें हैं। कट-ऑफ कम करने का मतलब यह नहीं है कि अयोग्य छात्र प्रवेश पा लेंगे; उन्हें अभी भी उपलब्ध सीटों के लिए अपनी रैंक के अनुसार ही प्रतिस्पर्धा करनी होगी। हालांकि, शिक्षाविदों का एक वर्ग इस बात से चिंतित है कि इससे पीजी प्रवेश परीक्षा की गरिमा कम होती है और भविष्य में प्रवेश प्रक्रिया के ढांचे में बदलाव की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
भविष्य की ओर देखते हुए
NBEMS ने स्पष्ट किया है कि संशोधित पात्रता सूची के आधार पर काउंसलिंग का शेड्यूल जल्द ही आधिकारिक वेबसाइट (mcc.nic.in) पर अपलोड किया जाएगा। उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे अपने दस्तावेजों के साथ तैयार रहें, क्योंकि विशेष स्ट्रे वेकेंसी राउंड बहुत कम समय के लिए आयोजित किया जाएगा। आगामी सत्र से, सरकार ‘नेशनल एग्जिट टेस्ट’ (NExT) के कार्यान्वयन पर विचार कर रही है, जो संभावित रूप से प्रवेश और पात्रता के इन मौजूदा मानदंडों को बदल सकता है।
NEET PG कट-ऑफ को घटाकर जीरो करना एक व्यावहारिक समाधान और नीतिगत बहस का मिश्रण है। जहाँ यह 95,000 डॉक्टरों के लिए नए द्वार खोलता है, वहीं यह भारत की चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को भी दर्शाता है। मुख्य निष्कर्ष यह है कि अब कोई भी सीट खाली नहीं रहनी चाहिए, जो देश में विशेषज्ञों की कमी को देखते हुए एक सकारात्मक कदम है।